‘बेड़ू पाको बारामासा’ की पहली धुन और ग्रामोफोन का दौर, डिजिटाइज होगा उत्तराखंड के स्वर्णिम संगीत का इतिहास
विलुप्त हो चुके 46 ग्रामोफोन लोकगीतों को खोजकर डिजिटल रूप से संरक्षित कर रहा ‘दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र’, रिपोर्ट- धीरज सजवाण देहरादून: ‘बेड़ू पाको बारोमासा, नारेणा काफल पाको चैता, मेरी छैला…’ यह लाइन सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान की सबसे बुलंद आवाज है. साल 1952 के अंतरराष्ट्रीय…

