दौड़ती भागती ज़िंदगी को रीसेट करना जरूरी – डॉ नितिन उपाध्याय

अगर आपको भी लगता है समय बहुत तेज भाग रहा तो ये पोस्ट शायद आपके लिए हो। दौड़ती भागती ज़िंदगी को रीसेट करना बहुत जरूरी है। आप देखते होंगे विकसित देशों में और बहुत से और देशों में लोग छुट्टियां लेकर घूमने जाते हैं, इसके लिए बढ़िया सेविंग करते हैं। भारत में भी यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। लेकिन सिर्फ छुट्टी लेना ही अपने आपको रीसेट करने का तरीका नहीं है । अपनी दैनिक रूटीन में कई बार छोटी छोटी चीजों में बदलाव कर हम अपना टाइम प्रोफाइल रीसेट कर सकते हैं।

समय की रफ्तार तेज नहीं हुई है, दरअसल हमारा दिमाग ही वक्त को फास्ट-फॉरवर्ड मोड में प्रोसेस कर रहा है। दिन, त्यौहार और साल इतनी तेजी से गायब हो रहे हैं जैसे सब कल की ही बात हो। एक न्यूरोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें, तो यह कोई वहम नहीं बल्कि हमारी सामूहिक चेतना और मॉडर्न लाइफस्टाइल का एक गहरा साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट है।

साइंटिफिक नजरिए से देखें तो हमारे मस्तिष्क की अपनी एक अलग परसेप्शन घड़ी होती है। न्यूरोसाइंस के मुताबिक, जब हम नई चीजें सीखते हैं या नए अनुभवों से गुजरते हैं, तो दिमाग बहुत सारे ‘मेमोरी स्नैप्स’ स्टोर करता है। जितनी ज्यादा यादें दर्ज होती हैं, बीता हुआ समय हमें उतना ही लंबा और ठहरा हुआ महसूस होता है। इसीलिए बचपन के दिन बहुत लंबे हुआ करते थे, गर्मी की छुट्टियाँ महीनों की लगती थीं। लेकिन बड़े होने पर हमारी दिनचर्या बहुत हद तक एक ढर्रे पर आ जाती है ऑफिस, बिज़नेस , स्क्रीन और फिक्स रूटीन। जब जीवन में नयापन कम होता है, तो दिमाग कम यादें प्रोसेस करता है, और मुड़कर देखने पर लगता है कि समय पलक झपकते ही निकल गया। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने 1890 में अपनी किताब ‘Principles of Psychology’ में ठीक यही रेखांकित किया था कि जैसे-जैसे हमारी जिंदगी में नए अनुभवों की जगह मशीनी आदतें ले लेती हैं, समय की अनुभूति और तेज होने लगती है। यानी जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और हमारी जिंदगी में नई चीजों की जगह पुरानी आदतें ले लेती हैं, समय हमें और तेज बीतता हुआ महसूस होने लगता है।


अगर इसे फिलॉसफिकली समझा जाए तो समस्या समय की नहीं, हमारी प्रेजेंस की है। फ्रांसीसी दार्शनिक हेनरी बर्गसन के अनुसार समय दो प्रकार का है एक भौतिक घड़ी का समय और दूसरा वह जिसे हम आंतरिक रूप से जीते हैं। हेनरी बर्गसन का कहना था कि आज की भागदौड़ और डिजिटल दुनिया में हम ‘अभी’ यानी वर्तमान में जीने के बजाय लगातार अगली डेडलाइन, अगले वीकेंड या आने वाले कल के बारे में सोच रहे होते हैं। जर्मन समाजशास्त्री और दार्शनिक हार्टमुट रोजा ने अपनी रिसर्च ‘Social Acceleration’ में स्पष्ट लिखा है कि हमने तकनीक से समय बचाने की कोशिश तो की, लेकिन इसने सामाजिक गति को इतना बढ़ा दिया कि हमारा जीवन एक निरंतर फास्ट-फॉरवर्ड लूप बन गया। जब हम खुद ही ‘आज’ में मौजूद नहीं हैं, तो दिन और साल तेजी से फिसलना स्वाभाविक है।

समय वास्तव में भागा नहीं है, बस हमारी जीवनशैली का एक्सीलेटर दब गया है। इसे धीमा करने का तरीका यही है कि हम अपने रूटीन के एकाधिकार को तोड़ें, कुछ नया अनुभव करें और माइंडफुलनेस को अपनाएं। सच तो यह है कि जिंदगी बीत नहीं रही, हमारी अति-व्यस्तता या अस्तता व्यस्तता हमें उससे तेजी से गुजार रही है। आप ख़ुद को रोकिए, आज में, वर्तमान में, देखिए समय भी रुक जाएगा।

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